Recharge her Long drive

कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार अब फुल फार्म में आ गई है। एनडीए जमाने के कई राज्यपालों एवं योजना आयोग के कई पुराने सदस्यों को घर का रास्ता दिखाया जा चुका है। अब विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों से जुड़े आयोगों और निगमों में काबिज एनडीए नेताओं को घर भेजने की तैयारी हैं। संभावना है कि अगले महीने तक इस तमाम प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाएगा।

प्रधानमंत्री कार्यालय के सचिव ने इस बारे में दस विभागों के सचिवों को पत्र लिख कर पूरा लेखा-जोखा मांगा है कि संबंधित मंत्रालयों में एनडीए से जुड़े नेताओं की संख्या कितनी हैं, जिससे कि अपने विचार से जुड़े लोगों और नेताओं को तरजीह दी जा सके।

सभी जानकारी 6 अगस्त तक मंागी गई हंै। सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय ने योजना आयोग के अलावा सूचना व प्रसारण,मानव संसाधन विकास,श्रम,शहरी विकास,पर्यटन,संसदीय कार्य मंत्रालयों के विभिन्न सचिवों को पत्र लिखकर इन मंत्रालयों से जुड़े आयोगों और निगमों की यथास्थिति के बारे में जानकारी मंगवाई हैं।

ये सभी मंत्रालय सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े हैं। इन मंत्रालयों में 40 ऐसे पद हैं,जिन पर एनडीए के नेताओं का अभी भी कब्जा बताया जाता है। इन मंत्रालयों से जुड़े आयोगों और निगमों की कुल संख्या 84 हैं, जिनमें 22 स्थायी हैं,शेष अस्थायी।

स्थायी पदों वाले आयोगों में फेरबदल के लिए कैबिनेट के पास अधिकार हैं,जबकि अस्थायी वालों के लिए संबंधित विभागों के मंत्रियों के पास अधिकार हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने तो मंत्री बनते ही यूपीए के कारक तत्व वामपंथी एजेंडे पर काम करना शुृरू कर दिया था,जिनमें क ई सलाहकार समितियों का आपरेशन जारी हैं ।

केन्द्रीय श्रम मंत्री शीशराम ओला ने भी अनौपचारिक निर्देश दिया था कि वे मंत्रालय के विभिन्न निगमों में यूपीए से जुड़े नेताओं को तरजीह दे, जबकि संस्कृति मंत्री एस.जयपाल रेड्ïडी अपने विभाग में अभी तक कुछ नहीं कर सके हैं।

सूत्रों को कहना है कि वह अभी तक अपना निजी सचिव तक तय नहीं कर सके हैं। युवा मामले और खेल मंत्रालय के मंत्री सुनील दत्त भी प्रधानमंत्री के निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में कुछ खास नहीं कर सके हैं।

केन्द्रीय पर्यटन राज्य मंत्री रेणुका चौधरी ने तो आनन-फानन में कुछ अफसरों को इधर-उधर करने की जहमत उठाई,परंतु कुछ अपने राष्टï्रीय अध्यक्ष सोनिया गंाधी की आशाओं के अनुरूप कई कार्य अभी तक शुरू नहीं कर सकी हैं।

जानकारों का कहना है कि वामपंथी प्रभाव वाले यूपीए सरकार के मुख्य एजेंडें में शिक्षा,सूचना-प्रसारण,संस्कृति,श्रम और नागरिक उड्ïडयन हैं। जिस पर प्राथमिकता के आधार पर आपरेशन शुरू हैं।

भिखारियों के भाव बढ़े

शहाबुद्दीन के सीवान में हुए साई नरसंहार के बाद से सुर्खियों में आ गए हैं सूबे के भिखारी। नरसंहार में साईं जाति के दर्जन भर लोग मारे गए। मार-काट के बाद सत्ता और विपक्ष का तीर्थस्थल बन गया सीवान का जगदीशपुर गांव।

पता चला जो मारे गए वे जाति के भिखारी थे, यानी ऐसी जातियां जिनका पेशा ही रहा है भीख मांगना। इस बीच विधान परिषद के सभापति और सामाजिक सरोकार का कुर्ता-पैजामा धारण करने वाले हुसैन साहब ने कर दिया धमाका।

हुसैन की खोजी राजनीति ने वह खोज निकाला, जिसका अता-पता बड़े-बड़े राजनीतिक धुरंधरों को भी नहीं था। लालूजी को भी नहीं, जो साईं कांड का दौरा तक कर आए थे। हुसैन ने 1951 का एक कानून खोज निकाला जो करीब डेढ़ दर्जन वैसी जातियों के बारे में था जो भिखारी हैं।

52 साल पुराने इस कानून का नाम है- बिहार प्रिवेंशन ऑफ बेगरी एक्ट। जिसके तहत भीख मांगने को कानूनी अपराध बनाने और उस बिरादरी का उत्थान करने की बात थी। हुसैन साहब भिखमंगों के पुनर्वास का शंख बजाने में जुट गए हैं।

संकट यह कि 52 सालों के भीतर सूबे में थोक भाव में बढ़े हैं भिखारी। राजा-रानी की चिंता यह कि बिहार को भिखारी बनाने से बचाएं या भिखारियों को बिहार में बसाएं। हुसैन, तूने यह क्या कर डाला।

बाहुबलियों पर विपदा

बाहुबली राजनीतिज्ञों के दिन कुछ अच्छे नहीं चल रहे समय खराब है। लोकसभा चुनाव से जो ग्रह दशा खराब हुई तो बस एक के बाद एक ग्रहण। कभी चुनाव आयेाग का चांटा तो कभी हाईकोर्ट ने हडक़ाया, तो कभी सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा।

अपराधी से विधायक बने, सांसद बने, बाजुओं का बल ढीला नहीं पड़ा थ। अब तो माथे पर बल पडऩे लगे हैं। बाहुबली बन गए हैं माथाबली। माथे पर बल की परेशानी खड़ी की है उड़ीसा ने। उड़ीसा विधानसभा ने कानूनी रूप से फरार विधायकों की हाउस एंट्री पर रोक लगा दी है।

इधर बिहार विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विधानसभा में भी नो एंट्री कानून पर विचार करने के शोशे से सांसत में आ गए हैं बाहुबली विधायक। ऐसा हुआ तो सदन के प्रत्येक सत्र में दर्जन भर से अधिक विधायक हाउस का मजा लेने से महरूम हो जाएंगे।

इनमें आधा दर्जन तो ऐसे हैं जो नियमित करते रहे हैं जेल की परेड। उधर रानी साहिबा के राजा भी रंग बदल कर दागियों को चुनाव से रोकने के कानून के पक्षधर हो गए हैं। ऐसे में रंगे सियार जगह-जगह गिरगिट पर गुस्सा कर रहे हैं। अच्छा, हम भी दिखा देंगे रंग विधानसभा चुनाव में।

देशरत्न की दुर्दशा

भारत रत्न तो बहुत बने, देशरत्न बना सिर्फ एक ही शख्स। सपूत बिहार का प्रथम राष्टï्रपति देश का। दर्ज करने वाली बात यह कि दुर्दशा झेल रहे हैं देशरत्न। जिस स्कूल में पढक़र राजेन्द्र बाबू बने राष्टï्रपति वह स्कूल अब तक नहीं पा सका सरकार से अपनी दो गज जमीन भी।

पटना के टी.के. घोष एकेडमी का हाल यह कि खंडहर हो गए हैं देशरत्न के क्लासरूम। बाबू की स्मृतियों को बचाने के लिए स्कूल के लडक़े मांग रहे हैं भीख और फुटपाथों पर कर रहे हैं बूट पालिश।

अल्लाह और भगवान के नाम पर भिक्षाटन करते देशरत्न के स्कूलियों को सबने देखा, नहीं नजर फिराई तो राजा-रानी के कुनबे ने। खास बात तो यह कि छपरा के ही थे तब के राजा- छपरा के ही हैं अब के राजा। दुर्दशा का आलम यह कि बिहार विद्यापीठ प्रांगण में रखा भारत रत्न का अमूल्य प्रमाण पत्र भी दीमक चाट गई। माफ कीजिएगा, डायरी की यह गप नहीं, असलियत है भाई।

नीतीश की नियति

कहते हैं नेता मजबूत होता है, तो पार्टी भी मजबूत होती है। नीतीश कुमार के साथ मामला कुछ उलटा-पुल्टा है। रेल मंत्री रह चुके नामी-गिरामी नीतीश बाबू को, एक तो लालू प्रसाद यह बोल-बोलकर उलटा लटका देते थे कि नीतीश को लोहा सूट नहीं करता। इशारा रहता ट्रेन उलटने की तेज रफ्तार पर।

अब तो खुद लालूजी रेलमंत्री बन गए। नीतीश का लोहा से पिंड छुटा। फिर भी विरोधी चैन नहीं लेने दे रहे। एक नई उलटबांसी का राग बजाने लगे हैं। राजनीतिक पंडित लोग एक नई व्याख्या करते फिर रहे हैं कि पार्टी में नीतीश का मजबूत होना भी उन्हें सूट नहीं करता।

लब्बो-लुआब यह कि जब-जब बढ़ता है नीतीश का बल, तब-तब टूट जाता है उनका दल। जनता से समता और जद-यू पार्टी में टूट के कई तांडव। बागी नेताओं की बड़ी फेहरिस्त और विरोध के तमाम लटके-झटके।

एनडीए की हार के बाद विधानसभा चुनाव में मजबूत मुकाबले के लिए कुमार साहब शंखनाद की तैयारी में हैं, तो तीन बड़े जद-यू नेताओं ने बागी बिगुल बजाकर एक बार फिर हवा निकालने में जुट गए हैं।

एक हैं कुर्मी चेतना रैली की ऐतिहासिक धमक से नीतीश बाबू को बडक़ा नेता बनाने वाले सतीश कुमार अर्थात चंद्रगुप्त के चाणक्य। अबकी बार भी बिगुल की फूंक ऐसी कि टूट तय है दल की। आखिरकार साहब को कैसे सूट करे पार्टी पालिटिक्स , चिंतित हैं शुभचिंतक।

गर्भवती घोटाला

घोटालेबाजों के दिमाग की भी दाद देनी पड़ेगी। खोजते रहते हैं नए-नए सुराख और बना ही लेते हैं कोई न कोई गुंजाइश। बाढ़ और राहत के मजामारु सीजन में तो व्यस्त हैं बड़े-बड़े धुरंधर। ऐसे में बेचारे छोटकन को भी तो कुछ खाद-पानी चाहिए।

कुछ नहीं मिला तो मिली गरीब गर्भवती सहायता योजना। गरीबों को कहां पता रहता है, कौन योजना, कैसी योजना। बस निकल आई गुंजाइश। राजा साहब के क्षेत्र में ही एक बीडीओ ने गपच लिए राष्टï्रीय मातृत्व लाभ योजना के हजारों रुपए।

राजधानी पटना के पास ग्रामीण इलाके में तो पुरुष भी बन गए गर्भवती। एक बड़े साहब ने आंगनबाड़ी केंद्र का औचक निरीक्षण किया तो लाभार्थी गर्भवती महिलाओं की सूची में पुरुषों का नाम देखा दंग रह गए।

स्तनपान सप्ताह पर ऊपर से यह सिफारिश आई कि आंगनबाड़ी केंद्र गर्भवती को सामान्य स्त्रियों से ज्यादा ख्ुाराक दें। ज्यादा खुराक की खबर से खिल उठी हैं घोटालेबाजों की बांछे।

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