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प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, रक्षामंत्री प्रणब मुखर्जी, गृहमंत्री शिवराज पाटिल और विदेश मंत्री नटवर सिंह आज बुधवार को कुछ चुनिंदा आला सैन्य अधिकारियों के साथ ‘वार रूम’ में थे। वो भी थोड़ी देर के लिए नहीं पूरे डेढ़ घंटे तक।

शांतिकाल में यह चौंकाने वाली महत्वपूर्ण कवायद दरअसल आज इसलिए हुई क्योंकि कल से नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच बेहद नाजुक सियाचिन ग्लेशियर के सवाल पर रक्षा सचिव स्तर की बातचीत यहां आरंभ हो रही है।

इस सवाल पर नई दिल्ली का रुख तय करने के लिए आज प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति (सीसीडी) की यह बैठक अपने आवास के सामान्य बैठक कक्ष में न करके ‘वार रूम’ में की।

बैठक में डीजीएमओ ले. जनरल ए.एस. मैया ने 72 किलोमीटर तक लंबे सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात सैन्य टुकडिय़ों का ब्यौरा रखा। थल सेना अध्यक्ष जनरल एन.सी. विज भी देश के राजनीतिक नेतृत्व को अपनी राय से अवगत कराने के लिए बैठक में मौजूद थे।

विज कल संभवत: सियाचिन जाकर भी जमीनी हकीकत से रू-ब-रू होंगे। अगले सप्ताह स्वयं रक्षामंत्री प्रणव मुखर्जी सियाचिन की यात्रा पर जाएंगे। रक्षा सचिव स्तरीय यह वार्ता इस मायने में और भी अहम है कि सात वर्षों के अंतराल के बाद यह फिर से शुरू हो रही है।

इस वार्ता में दोनों देशों की सेनाओं के बीच भरोसा बढ़ाने के नए कदमों पर विचार के साथ-साथ सियाचिन ग्लेशियर पर तनाव घटाने तथा सैन्य तैनाती कम करने के सवाल पर भी विचार होगा।

पाक दल का नेतृत्व वहां के रक्षा सचिव ले.ज.(सेवानिवृत) हामिद नवाज खान कर रहे हैं, जबकि भारतीय पक्ष की कमान रहेगी रक्षा सचिव अजय विक्रम सिंह के हाथों में। दोनों देशों के डीजीएमओ भी इस बातचीत में शामिल होंगे।

संकेत मिल रहे हैं कि इस्लामाबाद इस वार्ता में 1990 के उस फार्मूले पर फिर से जोर दे सकता है, जिसके तहत 1990 में दोनों देश सियाचिन में भारी-भरकम सैन्य तैनाती कम करने की दिशा में कदम उठाने के लिए वांछित समझ तक पहुंच गए थे।

लेकिन उस वक्त भारत ने इस बिन्दु पर जोर दिया था कि सबसे पहले सियाचिन पर एजीपीएल यानी ‘ एक्चुअल ग्राउंड पोजीशन लाइन’ का निर्धारण होना चाहिए। विषय की महत्ता को देखते हुए सरकार इस वार्ता को खासा अहमियत दे रही है।

संसदीय समितियों के बहिष्कार का मामला सुलझा तो उनकी अध्यक्षता को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में ठन गई है। विपक्ष वित्त, गृह और मानव संसाधन तीनों ही संसदीय समितियों की अध्यक्षता चाहता है तो सत्ता पक्ष इसके लिए तैयार नहीं हो रहा है।

राजग का कहना है कि जब वह सत्ता में थे तब उन्होंने तीनों महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता विपक्ष में बैठी कांग्रेस को दी थी। लेकिन कांग्रेस गठबंधन सरकार केवल एक ही समिति की अध्यक्षता देने पर अड़ी है।

समितियों की अध्यक्षता को लेकर दोनों पक्ष में टकराव को सुलझाने के लिए राज्यसभा के सभापति भैरोसिंह शेखावत ने दोनों पक्ष के नेताओं की बैठक भी बुलाई, लेकिन कोई हल नहीं निकला । कल फिर बैठक होने की संभावना है।

आज हुई बैठक में सत्तापक्ष की ओर से संसदीय कार्य मंत्री गुलाम नबी आजाद और राज्य मंत्री सुरेश पचौरी शामिल थे। विपक्ष की ओर से लोकसभा में भाजपा के उपनेता और राज्यसभा से सुषमा स्वराज और एस एस अहलुवालिया मौजूद थे।

भाजपा का कहना है कि लोकसभा की वित्त सबंधी समिति 1999 में राजग सरकार ने परंपरा निभाते हुए विपक्षी पार्टी कांगे्रस को दी थी, जिसके अध्यक्ष शिवराज पाटिल और फिर जनार्दन रेड्डïी रहे।

इसी तरह राज्यसभा में गृह और मानव संसाधन समितियों के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी और अर्जुन सिंह रहे। आईटी संबंधी संसदीय समिति को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच विवाद रहा। हालांकि सभापति कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि संभवत: कल तक कोई रास्ता निकाल लिया जाएगा।

बैठक के बाद भाजपा सांसद एस एस अहलुवालिया ने भास्कर से बातचीत में कहा कि विपक्ष की केवल इतनी ही मांग है कि तेरहवीं लोकसभा में जो क मेटियां विपक्ष के पास थी वो तीनों ही हम मांग रहे है ।

हम उन पर विश्वास कर सकते हैं, तो वो क्यों नहीं। संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष सरकार के कार्यो पर वॉच डाग की भूमिका निभाती है । कांग्रेस को विपक्ष को अध्यक्षता देने में डर क्यों? हम कोई अतिरिक्त समितियां तो नहीं मांग रहे।

बैठक के बाद हालांकि गुलाम नबी आजाद ने उम्मीद प्रकट की कि जल्दी ही मसला हल कर लिया जाएगा। संसद के दोनों सदनों की कुल 24 समितियां हैं, जिसमें से 16 लोकसभा की और बाकी की आठ राज्यसभा की।

यूपीए सरकार का कहना है कि इस बार कमेटियों की संख्य बढ़ गई हैं इसलिए अब नये सिरे से इसका बंटवारा करना चाहिए। सूत्रों का कहना है कि अर्जुन सिंह मानव संसाधन सबंधी कमेटी भाजपा के हाथ में नहीं देना चाहते हैं ।

जहां तक लोकलेखा समिति की अध्यक्षता का सवाल है वह विपक्ष के पास ही रहेगी। भाजपा अपने सांसद विजय कुमार मल्होत्रा को इस पद की अध्यक्षता देने पर विचार कर रही है।

बसपा की ‘लेडी कमांडर’ मायावती की निगाह अब महाराष्टï्र में होने वाले विधानसभा चुनावों पर है। वहां की चुनावी राजनीति की तासीर को परखने के लिए मायावती जल्द ही राज्य के दौरे पर जाने वाली हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिले वोट से उत्साहित मायावती महाराष्टï्र की जमीन अपनी पार्टी के लिए उर्वर मान रही हैं। पर यहां राष्टï्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस के साथ तालमेल पर अभी कुछ कहने से बच रही हैं।

पार्टी महासचिव और राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा ने दैनिक भास्कर से कहा कि मायावती इसी महीने खुद महाराष्टï्र जाएंगी और वहां के हालात का जायजा लेंगी। इसके बाद वे सबसे बात कर तालमेल के बारे में कुछ निर्णय करेंगी।

दरअसल महाराष्टï्र को लेकर खुद मायावती अभी दुविधा में हैं। वे यहां किसी गठबंधन के साथ ही चुनाव में जाना चाहती हैं। लेकिन बसपा के लिए गठबंधन सहयोगी चुनने से पहले वे राजनीतिक मोलभाव कर लेना चाहेंगी।

अभी तक महाराष्टï्र में कांग्रेस और राष्टï्रवादी कांग्रेस का आरपीआई के साथ गठबंधन है। शरद पवार आरपीआई की कीमत पर बसपा को महत्व देने के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व के साथ मायावती की निकटता जरूर है।

इसलिए बहिनजी अभी महाराष्टï्र को लेकर अपनी रणनीति को आकार देने से पहले अपनी हानि-लाभ का गणित भी लगा रही हैं।

महाराष्टï्र के अलावा बसपा उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए सितंबर में होने जा रहे कुछ उपचुनावों के लिए भी अपनी ब्यूह रचना कर रही हैं। सतीश चंद्र मिश्रा का कहना हैं- उत्तर प्रदेश में तो हम हमेशा ही तैयार रहते हैं।

फिर चाहें चुनाव हो या उपचुनाव। बसपा बिहार और हरियाणा में भी इस बार अपनी ताकत आजमाने का मन बनाती दिख रही है। मिश्र के मुताबिक – इन दोनों सूबों में हमारे कार्यकर्ता काम पर लगे हैं।

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