फिल्मी सेंसेक्स 80 करोड़ पर

परदे के पीछे स्टूडियो 18 नामक संस्था ने आशुतोष गोवारीकर की रितिक और ऐश्वर्या अभिनीत फिल्म ‘जोधा-अकबर’ के विश्व वितरण अधिकार 80 करोड़ रुपए में खरीदकर शाहरुख खान की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ के 75 करोड़ को पीछे छोड़ दिया है। नाडियादवाला की ‘वेलकम’ को यूटीवी ने 47 करोड़ में खरीदा था और स्टूडियो 1८ ने 54 करोड़ में बेच दिया है। अभी सौदों की पुष्टि नहीं हुई है।

फिल्मी मंडी में आग लगी है। इस तेजी का अर्थ यह नहीं है कि उद्योग अब बेहतर और पहले से ज्यादा कामयाब फिल्में बनाने लगा है या दुनिया भर के दर्शक हमारी भेलपुरी पर टूट पड़े हैं। सारी बड़ी खरीददार कंपनियां शेयर मार्केट में अपनी साख बना रही हैं और अमोरटाइजेशन के साथ जगलरी कर रही हैं। लंदन की एक बड़ी कंपनी जिसने यह तेजी का खेल शुरू किया है, विगत नौ महीने में 37 करोड़ का घाटा खा चुकी है, परंतु आंकड़ों और अमोरटाइजेशन की बेलेंसशीटीय जगलरी से चेहरे पर लाली कायम है। पड़ा थप्पड़ है, परंतु लाली को जवानी बता रहे हैं। विदेश क्षेत्र के डॉलर की कमाई में भी डीवीडी की बिक्री से 55 प्रतिशत आय होती है, जबकि टिकट खिड़की से मात्र 45 प्रतिशत मिलता है।

विदेशों में व्यवसाय कर रहे कुछ नामी वितरक स्वयं अपनी फिल्मों के अवैध डीवीडी बाजार में लाकर उस तरह की कमाई करते हैं, जो उन्हें निर्माता के साथ बांटना नहीं पड़े। सोनी इंटरनेशनल विदेश क्षेत्र में अपनी ‘सावरिया’ का वितरण कर रहे हैं और अवैध डीवीडी के खिलाफ सख्ती से निगाह रखने के लिए उन्होंने विशेषज्ञ कंपनी की सेवाएं ली हैं। अत: ‘सावरिया’ का डीवीडी का व्यवसाय नया रिकार्ड कायम कर सकता है और शाहरुख को भी बहुत कुछ सोचने पर विवश कर सकता है। आज सिर्फ एक सफल फिल्म बनाना ही काफी नहीं है, वरन उसके व्यवसाय को डकैतों से बचाना भी सीखना जरूरी है।

फिल्मी मंडी की यह तेजी महज फुगावा है। आप गुब्बारे में हवा भरते जाइए, तो वह एक दिन फूटेगा। इस तेजी का दुखद परिणाम यह है कि सितारों का लालच बढ़ गया है और उन्हें अपना सातवें आसमान पर पहुंचा मेहनताना जायज लगने लगा है। इस रोलर कोस्टर की असामान्य गति के कारण सिनेमा में सामाजिक प्रतिबद्धता और गुणवत्ता के अहम तत्व गौण हो गए हैं। इस समय सिनेमा काठ के घोड़े पर सवार है। ज्ञातव्य है कि बच्चों के खेलने के लिए बना यह घोड़ा अपने अर्धवृत्ताकार तल के कारण गति का क्रम देते हुए अपनी जगह कायम रहता है। इस तेजी ने न केवल स्थापित सितारों को जमीनी हकीकत से दूर कर दिया है, वरन उभरते सितारों के दिमाग भी खराब कर दिए हैं। अब सार्थक सिनेमा के रचने वाले इन उभरते हुए सितारों को भी मिल नहीं पाते। अच्छी पटकथाएं दफन हो रही हैं। नेक इरादों को नजर लग गई है।

फिल्मों के गैर-सिनेमा प्रदर्शन अधिकार अब बहुत महंगे में बिकने लगे हैं। अभी बाजार का यह पक्ष और उभरेगा, क्योंकि फिल्में अपने विभिन्न स्वरूपों में अकल्पनीय स्थानों पर देखी जा सकती हैं। मोबाइल पर डायल करके मनपसंद फिल्म देखने की विधा विकसित हो रही है। टेक्नोलॉजी ने बाजार के नए आयाम खोल दिए हैं। साथ ही फिल्मांकन में भी ‘टेक्नोलॉजी’ मनुष्य की कल्पना शक्ति के लिए चुनौती बन गई है। याद आती हैं कैफी आजमी की फिल्म ‘कागज के फूल’ के लिए लिखी पंक्तियां ‘ये खेल है कब से जारी, बिछड़े सभी बारी-बारी।’

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