जैव कृषि से बदला किसानों का जीवन

जैव कृषि से झुंझुनु जिले के किसानों की तकदीर ही बदल गई। नहीं तो वो दिन नहीं दूर थे जब उनकी दशा भी महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के किसानों जैसी खराब हो जाती। इन किसानों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया और समय रहते जैव कृषि को अपना कर स्थिति बदतर होने से बचा ली। इसके लिए इन किसानों ने पारंपरिक जैव कृषि को अपनाया ।

दिन ब दिन भूमि की घटती उर्वरकता को भांप किसानों ने समय रहते भांप लिया था। कृत्रिक उवर्रकों का प्रयोग बंद करके जैव कृषि के तहत किसानों ने जैव कृषि के पारंपरिक तरीके को अपनाया।

जमालपुरिया जैव कृषि फार्म के मुरली प्रसाद सैनी ने बताया कि सात साल पहले उन्होंने कृषि की इस विधा को अपनाया जिसका सकरात्मक परिणाम निकला। उन्होंने बताया कि पूर्व में वे उर्वरकों और रसायनों पर आधारित कृषि पर निर्भर थे। इनके प्रयोग से जमीन की कड़ी होती गई।

जमीन द्वारा पानी सोखने की क्षमता भी घटती गई। फसलों का उत्पादन घटने लगा और जमीन के बंजर होने का खतरा पैदा होने लगा। इसके बाद उन्होंने जैव कृषि को अपनाया। जानवरों के मल मूत्र से तैयार खाद का प्रयोग शुरू किया। इसके साथ ही अन्य प्राकृतिक पदार्थो का उपयोग करके उन्होंने खेतों को फिर से नया जीवन दे दिया। इससे जमीन में फिर पानी सोखने की क्षमता बढ़ने लगी और फसलों का उत्पादन भी बढ़ने लगा।

इसी क्षेत्र के किसान सतवीर लांबा ने बताया कि उन लोगों ने एक योजना के तहत जैव कृषि को अपनाया। लांबा अपने कृषि उत्पादों को मुंबई और दिल्ली के बाजारों में बेचते हैं। उन्होंने बताया कि अन्य राज्यों में किसान बगैर दूरदर्शिता अपनाए मनमाने तरीके से उर्वरकों और रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। इससे जमीन की उपजाऊ क्षमता में ह्रास होता जाता है। उन्होंने बताया कि जैव कृषि को अपनाने से उर्वरकों और कीटनाशकों पर व्यय होने वाला खर्च कम हो जाता है और फसलों का उत्पादन भी बढ़ जाता है।

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